Friday 04, April 2025
शुक्ल पक्ष सप्तमी, चैत्र 2025
पंचांग 04/04/2025 • April 04, 2025
चैत्र शुक्ल पक्ष सप्तमी, कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत 1947 (विश्वावसु संवत्सर), चैत्र | सप्तमी तिथि 08:12 PM तक उपरांत अष्टमी | नक्षत्र आद्रा 05:20 AM तक उपरांत पुनर्वसु | शोभन योग 09:45 PM तक, उसके बाद अतिगण्ड योग | करण गर 08:52 AM तक, बाद वणिज 08:13 PM तक, बाद विष्टि |
अप्रैल 04 शुक्रवार को राहु 10:46 AM से 12:20 PM तक है | चन्द्रमा मिथुन राशि पर संचार करेगा |
सूर्योदय 6:07 AM सूर्यास्त 6:33 PM चन्द्रोदय 10:29 AM चन्द्रास्त 1:29 AM अयन उत्तरायण द्रिक ऋतु वसंत
- विक्रम संवत - 2082, कालयुक्त
- शक सम्वत - 1947, विश्वावसु
- पूर्णिमांत - चैत्र
- अमांत - चैत्र
तिथि
- शुक्ल पक्ष सप्तमी
- Apr 03 09:41 PM – Apr 04 08:12 PM
- शुक्ल पक्ष अष्टमी
- Apr 04 08:13 PM – Apr 05 07:26 PM
नक्षत्र
- आद्रा - Apr 04 05:51 AM – Apr 05 05:20 AM
- पुनर्वसु - Apr 05 05:20 AM – Apr 06 05:32 AM

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आज का सद्वाक्य




नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन

!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष 04 April 2025 गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
अपनी वाणी को संशोधित कर लीजिएए फिर आप अपनी जबान से कहिएए जबान से कहिए कि तेरा भला हो जाएए आशीर्वाद हो जाए और तेरा कल्याण हो जाए। फिर देखना कि होता है या नहीं होता हैए क्या होता है या क्या नहीं होता हैए कैसी चीजें होती चली जाती हैं तेरी वाणी से। और आपकी आँखेंए आँखों को संशोधित कर लीजिए। बस एक काम कीजिएए आँखों को संशोधित कर लीजिए। आँखों को संशोधित कैसे कर लेंघ् ऐसे कर लेंए आँखों को संशोधितए जैसे गांधारी ने कर ली थी। गांधारी ने क्या किया थाघ् आँखों पर पट्टी बांध ली थी। हम भी पट्टी बांध लें। हाँए बेटेए पट्टी बांधेंए चाहे मत बाँधें। पट्टी बांधने का मतलब ये है कि दूसरे व्यक्तियों के समीपए नर और नारी की जो मान्यता हैए उसके बारे में उसने आँखों पर पट्टी बांध ली थी। अर्थातए जो उसका बुड्ढा पति थाए अंधे पति और बुड्ढे पति के साथ जो उसकी शादी हुई थीए उसने आँखों से पट्टी बांध ली। उसने कहाए दुनिया में मर्द एक ही हैए और दूसरा कोई मर्द है ही नहीं। एक पट्टी बांधी और आँखों का संशोधन करने के पश्चात न कोई जप कियाए न ध्यान कियाए न पूजा कीए न उपासना कीए न अनुष्ठान किया।
गांधारी आँखों से जो पट्टी बंधी थीए पट्टी बंधी हैए इससे मतलब समझने लगा। पट्टी से मतलब ये नहीं है कि कौन सा जो आँख से पट्टी बाँधें। सूरदास ने आँखें फोड़ ली थीए फोड़ ली थीए बेटाए हमें नहीं मालूम। हम भी आँख फोड़ेंगे तो भगवान दिखाई पड़ेंगेए ये गलती मत करना। आँखें फोड़ने से मतलब वहाँ कोई और है। आँखें फोड़ने से मतलब ये है कि हमारी जो कमीनी आँखेंए दुष्ट आँखेंए जो नारी मात्र को विषय के रूप से देखती हैंए अगर हम इस नारी की आँखों को हम खोल लेंए इसको हम बदल लेंए जो भी काम कर लेंए फिर आप देखना आँखों का चमत्कार कैसे होता है।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
नवरात्रि अनुष्ठान में मन को एकाग्र तन्मय बनाने के साथ जप के साथ ध्यान की प्रक्रिया को सशक्त बनाया जाता है। मातृभाव में ध्यान तुरंत लग जाता है व जप स्वतः होठों से चलता रहता है। ध्यान तब माला की गिनती की ओर नहीं जाता। उँगलियों से माला के मन के बढ़ते जाते हैं, ध्यान मातृसत्ता का अनन्त स्नेह व ऊर्जा देने वाले पयपान की ओर लगा रहता है। इस अवधि में आत्मचिन्तन विशेष रूप से करना चाहिए। मन को चिन्ताओं से जितना खाली रखा जा सके-अस्तव्यस्तता से जितना मुक्त हुआ जा सकें, उसके लिए प्रयासरत रहना चाहिएं आत्मचिन्तन में अब तक के जीवन की समीक्षा करके उसकी भूलों को समझने और प्रायश्चित के द्वारा परिशोधन की रूपरेखा बनानी चाहिए। वर्तमान की गतिविधियों का नये सिरे से निर्धारण करना चाहिए।
उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्त्तव्य अपने क्रियाकलापों में अधिकतम मात्रा में कैसे जुड़ा रह सकता है, उसका ढांचा स्वयं ही खड़ा करना चाहिए और उसे दृढ़तापूर्वक निबाहने का संकल्प करना चाहिए। भावी जीवन की रूपरेखा ऐसी निर्धारित की जाय जिसमें शरीर और परिवार के प्रति कर्त्तव्यों का निर्वाह करते हुए आत्मकल्याण के लिए कुछ करते रहने की गुंजाइश बनी रहे। साधना-स्वाध्याय-संयम-सेवा, यही है आत्मोत्कर्ष के चार चरण। इनमें एक भी ऐसा नहीं है, जिसे छोड़ा जा सके और एक भी ऐसा नहीं है जिस अकेले के बल पर आत्मकल्याण का लक्ष्य पूरा किया जा सके।
अस्तु मनन और चिन्तन द्वारा इन्हें किस प्रकार कितनी मात्रा में अपनी दिनचर्या में सम्मिलित रखा गया, इस पर अति गम्भीरतापूर्वक विचार करते रहना चाहिए। यदि इससे भावी जीवन की कोई परिष्कृत रूपरेखा बन सकी और उसे व्यवहार में उतारने का साहस जग सका तो समझना चाहिए कि उतने ही परिमाण में गायत्री माता का प्रसाद तत्काल मिल गया। यह सुनिश्चित मानना चाहिए कि श्रेष्ठता भरी गतिविधियाँ अपनाते हुए ही भगवान की शरण में पहुँच सकना और उनका अनुग्रह प्राप्त करना सम्भव हो सकता है।
गायत्री परम सतोगुणी-शरीर और आत्मा में दिव्य तत्वों का आध्यात्मिक विशेषताओं का अभिवर्धन करने वाली महाशक्ति है। वर्ष की दो नवरात्रियों को गायत्री माता के दो आयातित वरदान मानकर हर व्यक्ति द्वारा सम्पन्न किया जाना चाहिए। इस अवधि में उनका कोमल प्राण धरती पर प्रवाहित होता है, वृक्ष वनस्पति नवलल्लव धारण करते हैं, जीवन-जन्तुओं में नई चेतना इन्हीं दिनों आती है। विधिपूर्वक सम्पन्न नवरात्रि साधना से स्वास्थ्य की नींव तक हिल जाती हैं एवं असाध्य बीमारियाँ तक इस नवरात्रि अनुष्ठान से दूर होती देखी गयी हैं।
अखण्ड ज्योति मार्च 1996
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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