Magazine - Year 1998 - Version 2
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Language: HINDI
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वीतराग महायोगी - बन्दा वैरागी
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आप रक्षा कर सकते हैं, आप बचा सकते हैं मेरे बच्चे को। वह वृद्धा क्रंदन कर रही थी। आप योगी है। आप महात्मा हैं। मेरा और कोई सहारा नहीं है।
मेरा बेटा अब जी जाएगा। बुढ़िया उल्लासपूर्वक उठ खड़ी हुई उसने नहीं देखा कि बन्दा के नेत्र भर आए है। तुम्हारी तपस्या पूरी हो। तुम अकालपुरुष के प्यारे बनो। आशीर्वादों की वर्षा करती वह अपने घर की ओर लौट पड़ी।
पूरे पंजाब में बन्दा वैरागी अतिमानव, लोकोत्तर चमत्कारी महापुरुष माने जाते थे। वे पराजित किए जा सकते है। यह तो कोई सोच भी नहीं सकता था। धीर सिंह ने देखा कि हल पकड़ने वाले हाथ अब भाला या तलवार उठाए है। ग्रामीण तरुणों की संख्या बढ़ती जा रही है। बूढ़े तक दौड़े आ रहे है। प्रताप तो सर्वत्र परमात्मा का।’ बन्दा ने किसी अलक्ष्य के प्रति मस्तक झुकाया।” मिट्टी के किसी पुतले का प्रताप क्या हो सकता है। तुम इन नवीन सैनिकों को सँभाल लोगे? ”जैसी आपको आज्ञा।” धीरसिंह ने ग्रामीण तरुणों को परिस्थिति समझायी और उन्हें व्यूहबद्ध करना प्रारंभ किया। धीरसिंह कह रहे थे-आप सबके सेनापति इस समय बन्दा बैरागी है-महायोगी बैरागी। आपको उनकी आज्ञा का अक्षरशः पालन करना है।”
“हम पालन करेंगे। बैरागी की आज्ञा तो परमात्मा की आज्ञा है। उसे अस्वीकार कोई कैसे कर सकता है?”
पता नहीं था कि शत्रु किधर से आक्रमण करेगा, वह गाँव पर घेरा डालेगा या सीधे घुस पड़ना चाहेगा किन्तु बैरागी ने शत्रु की संख्या या उनके व्यूह की अपेक्षा कब की है। उनका अश्व जैसे वायु में उड़ रहा था। उनका आदेश उनके सैनिक यंत्रवत पालन कर रहे थे। घड़ी भर में गाँव से एक कोस दूर तक चारों ओर मोर्चा जम गया। वृक्षों के शिखर, ऊँचे टीले, गहरे खड्डा सब कही बैरागी के सैनिक सावधान बैठ चुके थे और मैदान में बन्दा के साथ चुने हुए इस घुड़सवार धूल उड़ाते दौड़ लगा रहे थे।
और कुछ ही देर में नजारे ने बदला हुआ रूप ले लिया। एक बार फिर सबको मानना पड़ा कि सचमुच विजय बन्दा बैरागी के चरणों में रहती है। शत्रु का सैन्यदल ठीक कितना था पता नहीं पाँच हजार से अधिक ही होगा। बैरागी के पास कुल पच्चीस सैनिक थे और ग्रामीणों को भी गिन लें तो पाँच सौ से अधिक नहीं। किन्तु युद्ध कठिनाई से तीन चला होगा।
सेना सूबेदार की ही थी, किन्तु वह न तो बैरागी को पकड़ने आयी थी न उनसे युद्ध करने की प्रस्तुत थी। वे लोग तो आए थे-गाँव के निरीह लोगों को लूटने काफिरों को कत्ल करके गाजी बनने साथ ही कोई सुन्दर-सी लड़की को अपनी वासना का शिकार बनाने। उन सैनिकों के भाव भी इसी प्रकार के थे। सिर सौदा करने को उनमें से कोई तैयार न था। बैरागी से सामना हो जाएगा, यह उन्हें पता होता तो इधर कदम रखने की भूल वे कर नहीं सकते थे।
‘अल्लाह हू अकबर’ की पुकार करती आततायियों की समुद्र-सी उमड़ती वह सेना किन्तु उसने सुना ‘सतश्री अकाल’ वाह गुरु की फतह।” बन्दा बैरागी की जय’ और उनके मुखों से अल्लाह हो अकबर बन्द हो गया। वे ‘या खुदा। या अल्लाह। चिल्लाने लगे।
बन्दा बैरागी। शैतान का फरिश्ता है यह काफिर। हवाइयाँ उड़ने लगी शत्रु सैनिकों के मुख पर। शैतान इसके तीरों को सौ गुना कर दिया करता है। मौत इसके साथ दौड़ती है।
सचमुच मौत ही दौड़ रही थी, बन्दा के अश्व के साथ। उनका अश्व जिधर से निकल जाता था, उनके बाणों की बौछार उधर की भूमि को लाशों से ढँक देती थी।
बैरागी आ गया। कयामत उतर आयी उसके साथ। बहुत शीघ्र के पैर उखड़ गए। अपने घायलों तक को कराहते छोड़कर वे भागे और भागते चले गए। उन्हें बन्दा नहीं, बन्दा का भय खदेड़े चला जा रहा था, क्योंकि भागते शत्रु को न बैरागी कभी खदेड़ते थे और न उन पर चोट करते।
“आपकी कृपा से हमने विजय प्राप्त की। “ बन्दा युद्ध से लौटे थे और अपने सदा के नियम के अनुसार वे किसी पर्वत पर अकेले ध्यान करने जाना चाहते थे। धीरसिंह ने आग्रह किया-शत्रु से लूटी सामग्री के वितरण का तो आप आदेश देते जाएँ।”
“आप साक्षात भगवान है। आपने मेरे पुत्र जीवित कर दिया। “ अचानक वह वृद्धा आ गिरी बैरागी के चरणों पर। उसके साथ आया था उसका पुत्र। अब भी वह बहुत दुर्बल था, किन्तु उसके मुख पर आरोग्य की चमक आ चुकी थी।
“माता परमात्मा को धन्यवाद दो। तुम्हारे पुत्र को उन दयामय ने अच्छा कर दिया है। “बन्दा बैरागी ने धीरसिंह की ओर मुख किया “और भाई तुम भी। विजय उस परम प्रभु की हुई और उसी की शक्ति से हई।
“फल हुआ-वह प्रभु की कृपा, उनका प्रसाद “बैरागी अश्व पर बैठते हुए बोले-उसे अपने कर्म का फल मानकर पूरे कर्म का उत्तरदायित्व क्यों सिर पर लेते ही। अपने को-कर्मफल का कारण कभी मत बनाओ फल को भगवान पर छोड़ दो। कोई कर्म तुम्हें बाँध नहीं सकेगा।’6
बैरागी का अश्व उड़ चला। विजय में प्राप्त श्रेय तथा सम्पत्ति न कभी वे लेते थे और न उसकी व्यवस्था का कोई आदेश देते थे। परम वीतराग होना ही उनका ऐश्वर्य था।