Magazine - Year 1959 - Version 2
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संस्कारों और त्यौहारों में सामूहिकता की आवश्यकता
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(श्री गिरिजा सहाय, ‘साहित्य भूषण’)
भारतीय संस्कृति का उद्देश्य व्यक्ति को और उसके द्वारा समाज को धर्मपरायण एवं कर्तव्यनिष्ठ बनाना है। ये ही दो बातें किसी भी मनुष्य को सुसंस्कृत कहलाने का अधिकार देती हैं। इसलिये हमारी प्राचीन संस्कृति के सभी आदर्श और विधि-विधान ऐसे रखे गये हैं कि उनके द्वारा मनुष्य की भौतिक उन्नति होने के साथ-साथ मानसिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी उसका उत्थान हो।
हिन्दू-समाज में प्रचलित जात कर्म, यज्ञोपवीत, विवाह आदि से लेकर अंत्येष्टि क्रिया तक जो सोलह संस्कार प्रचलित हैं उनका मुख्य उद्देश्य यही है कि उनके द्वारा संस्कार किये जाने वाले व्यक्ति पर और दर्शकों पर भी कल्याणकारी प्रभाव पड़े। इन संस्कारों में प्रयोग किये जाने वाले वैदिक मंत्रों में एक विशेष प्रकार की सूक्ष्मशक्ति पाई जाती है और शिक्षाएँ भी उच्च कोटि की दी गई हैं। उनसे लोगों पर बहुत उत्तम मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ सकता है बशर्ते कि संस्कारों को उनका आशय समझकर उपयुक्त ढंग से किया जाय। जिस समय हमारे समाज में उनका वास्तविक रूप में प्रचार था और ज्ञानी ऋषि मुनियों द्वारा वे शास्त्री विधान से प्रयुक्त किये जाते थे उसी काल में ऐसे व्यक्ति उत्पन्न हुये हैं जिनका नाम व यश सहस्रों वर्ष बीत जाने पर अभी तक स्थिर है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि मनुष्य के चरित्र-निर्माण और मनोभूमि को सुसंस्कृत बनाने के लिये ये संस्कार भारतीय संस्कृति की महान देन हैं।
इन संस्कारों के महत्व और लाभों को देखते हुये हमारा कर्तव्य है कि उनमें समयानुकूल थोड़ा-बहुत परिवर्तन करके उनका अपने घरों में प्रचार करें। यदि समस्त संस्कारों का करना कठिन जान पड़े तो भी जन्मोत्सव तथा यज्ञोपवीत संस्कार तो अच्छे रूप में मनाना ही चाहिये। इनमें सबसे पहली बात इनको सामूहिक रूप देने की है। यज्ञोपवीत संस्कार को तो यदि बड़े-बड़े यज्ञों के अवसर पर सामूहिक रूप से किया जाय तो समाज का बड़ा उपकार हो सकता है। वर्तमान समय में इस संस्कार को बड़ा खर्चीला बना दिया गया है जिससे अधिकाँश व्यक्तियों ने उसका करना ही बन्द कर दिया है। और बहुत से विवाह के समय ही उसकी रस्म भी नाम मात्र को पूरी कर देते हैं। इसलिये आजकल इस संस्कार को यदि बड़े-बड़े यज्ञों के अवसर पर सामूहिक रूप से किया जाय तो सब तरह लाभ ही है। इन यज्ञों में सब प्रकार की व्यवस्था, योग्य आचार्य, उत्सव की तैयारियाँ पहले से ही होती हैं। उस समय यज्ञोपवीत पूर्णतः शास्त्रानुकूल रीति से हो सकता है और इतने बड़े जन-समुदाय के समक्ष प्रतिष्ठित व्यक्तियों के हाथ से ग्रहण करने के कारण उसका महत्व भी हृदय पर अंकित हो जाता है। यज्ञोपवीत की यह व्यवस्था लाभदायक ही नहीं वरन् वर्तमान परिस्थिति को देखते हुये हम तो इसे अनिवार्य ही मानते हैं। यदि इसे नहीं अपनाया जायगा तो धन तथा श्रद्धा दोनों के अभाव से कुछ समय में इसका चिन्ह भी शेष न रहेगा।
इसी प्रकार जन्म दिन का जन्मोत्सव संस्कार भी कम से कम खर्च में सामूहिक हवन करके या केवल सत्संग करके ही अवश्य करना चाहिये। इसमें मुख्य बात तो वे शिक्षाएँ हैं जो इस अवसर पर विद्वान और अनुभवी जनों से प्राप्त होती है। इन सब अवसरों पर सामूहिकता का ध्यान अवश्य रखना चाहिये, क्योंकि कलियुग में इसी का सर्वाधिक महत्व है। सामूहिक कार्यक्रमों से पारस्परिक प्रेमभाव, आत्मीयता एवं संगठन शक्ति की वृद्धि होती है और अनेकों कठिन समस्याएँ स्वयमेव हल हो जाती हैं।
जिस प्रकार व्यक्तिगत जीवन के उत्थान और निर्माण के लिये संस्कारों की रचना की गई है, उसी प्रकार समस्त समाज को संगठित और सुसंस्कृत बनाने के लिये हमारे पूर्वजों ने विभिन्न त्यौहारों की स्थापना की थी। इनमें से प्रत्येक त्यौहार के भीतर एक विशेष आदर्श निहित है जिससे व्यक्ति को समाज के प्रति अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्व की शिक्षा मिलती है। यह एक प्रत्यक्ष बात है कि केवल लिखने-पढ़ने या उपदेश देने से मनुष्य पर बहुत कम प्रभाव पड़ता है, पर बड़े-बड़े प्रदर्शनों और उत्सवों द्वारा उसे ये उपयोगी शिक्षाएं सहज ही में दी जा सकती हैं। फिर हमारे देश में तो अभी पढ़े लिखे व्यक्तियों की संख्या ही नाममात्र को हैं। खासकर ग्रामीण जनता तो अब भी अधिकाँश में निरन्तर ही है। इस लिये प्राचीन काल के महापुरुषों और सच्ची देवियों के चरित्रों का स्मरण कराने वाले त्यौहारों का आदर्श रूप में मनाना समाज के लिये सब प्रकार से हितकारी है।
पर इसके लिये सबसे पहली बात यह है कि समय के प्रभाव से त्यौहारों के मनाने में जो हानिकारक रूढ़ियां घुस गई हैं और उनका जो विकृत रूप हो गया है उसका सुधार अवश्य करना चाहिये। उदाहरण के लिये होली हमारे यहाँ का सबसे बड़ा सामूहिक त्यौहार है, और समाज के संगठन का उससे बढ़कर दूसरा अवसर मिल नहीं सकता। पर धीरे-धीरे लोगों ने उसको ऐसा बिगाड़ दिया है और इतनी अधिक गन्दगी उसमें भर दी है, कि ज्यादातर भले आदमी तो उसमें भाग लेना तो दूर उस दिन घर से बाहर निकलना भी पसन्द नहीं करते। वह एक प्रकार से हुल्लड़बाजों और आवारा ढंग के लोगों का उत्सव बन गया है। इसी प्रकार दिवाली में भी जुआ खेलने की ऐसी परिपाटी चला दी है कि उससे हजारों व्यक्तियों का सर्वनाश हो जाता है। जो त्यौहार इतने अधिक नहीं बिगड़े हैं, वे भी केवल चिन्ह-पूजा के रूप में रह गये हैं, और उनका उद्देश्य पकवान, मिष्ठान्न बनाकर खा लेना और कोई छोटा-मोटा कर्मकाण्ड कर लेना ही रह गया है। यह स्थिति वास्तव में बड़ी निराशाजनक है। जिस देश या जाति के प्रेरणा-दायक सामाजिक उत्सव और त्यौहार शिथिल और विकृत हो जाते हैं, वहाँ का समाज भी दुर्बल हो जाता है।
यदि हम भारतीय संस्कृति का पुनरुत्थान करना और अपने समाज को सुदृढ़, सुसंगठित और समझ लोगों के सम्मुख खड़े होने लायक बनाना चाहते हैं तो हमको अपने यहाँ व्रत त्यौहारों और उत्सवों की प्राचीन परिपाटी को पुनर्जीवित करना होगा और उनमें समानुकूल नवीन हितकारी बातों का समावेश भी करना होगा। इस कार्य में हमारे गायत्री-परिवार की शाखायें बहुत कुछ भाग ले सकती हैं। इसमें सबसे पहली आवश्यकता तो यह है कि ये त्यौहार समस्त देश में एक ही विधि-विधान से मनाये जाने चाहिये। इसका एकमात्र उपाय यही है कि प्रत्येक त्यौहार के शास्त्रीय रूप को समझकर उसके आधार पर ही उसमें वर्तमान परिस्थिति के अनुकूल हितकारी तत्वों का समावेश करके उसका कार्यक्रम निश्चित करना चाहिए। इसके लिये प्रत्येक स्थान की शाखायें अपने सदस्यों तथा अन्य जनता को भी, जो भाग लेने को राजी हों, एक सार्वजनिक स्थान पर अथवा अपने “गायत्री-ज्ञान-मन्दिर” में एकत्रित करके त्यौहारों को सामूहिक रूप से मनाने की व्यवस्था करें। त्यौहार के धार्मिक और आकर्षक तत्वों की रक्षा करते हुये उसके पीछे जो आदर्श और इतिहास हो उसे प्रवचन, उपदेश, भजन, कीर्तन, नाटक आदि द्वारा जनता के अन्तःकरण में उतारने का प्रयत्न किया जाय। जहाँ अभी “गायत्री-ज्ञान मन्दिर” न हों वहाँ किसी अन्य अच्छे सार्वजनिक मन्दिर में या किसी सदस्य के घर पर ही कार्यक्रम रखा जा सकता है।
इस प्रकार हमारा हर एक संस्कार और त्यौहार व्रतोत्सव, पर्व आदि एक सार्वजनिक सामूहिक सम्मेलन का रूप धारण करके समाज के लिये हितकारी सिद्ध हो सकता है। उसका मुख्य उद्देश्य जनता में नैतिकता और सच्चरित्रता के भावों का उत्पन्न करना ही होना चाहिये। इससे हमारे साँस्कृतिक पुनरुत्थान में भी काफी सहायता मिल सकती है।