
मृत्यु न तो जटिल है और न दुःखद
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मृत्यु के समय कैसा अनुभव होता होगा? इस प्रश्न का उत्तर मरने वाले की मनःस्थिति को देखकर दिया जा सकता है।जीवन भर के संग्रहित विचार और संस्कार मरने के समय उभरते हैं उनमें से जो अधिक तीव्र होते हैं उन्हें स्मृति पटल पर प्राथमिकता मिलती है; अन्य स्मृतियाँ गौण हो जाती हैं। जीवन भर जो सोचा — जो चाहा और जो किया गया है प्रायः उन्हीं का सम्मिलित पर, चेतना आकाश में घटा बनकर छाया होता है और मरणासन्न व्यक्ति उन्हीं भले−बुरे संस्कारों का छाया चित्र देखता है। उन घड़ियों में सचेतन मन क्षीण हो जाता है और अचेतन का प्राबल्य रहता है। अचेतन के लिए भावना प्रवाह को दृश्य चित्र जैसा बनकर प्रस्तुत कर देना सरल है।
भारत के गृहमन्त्री पंडित गोविन्दबल्लभ पंत की मृत्यु से पन्द्रह दिन पूर्व की एक घटना है अपने सेक्रेटरी को वे अँग्रेजी में बोलते हुए कुछ नोट लिखा रहे थे। वे कुछ न रु के और हिन्दी में बोलने लगे। सेक्रेटरी अकचकाया कि प्रवाह कैसे बदला। बात वह भी पूरी न पड़ी फिर वे अपनी मातृभाषा पहाड़ी में बोलने लगे। इसके बाद वे एकदम मौन हो गये।
घटना मामूली सी है पर उससे इस तथ्य का रहस्योद्घाटन होता है कि मृत्यु से पूर्व आत्मा पर चढ़े वाह्य आवरण उतरते जाते हैं और वह सुस्थिर संस्कारों की भूमिका में जागृत होता जाता है। अँग्रेजी बाहरी भाषा थी− हिन्दी भी उनने स्कूल जाने पर सीखी जन्म से तो पंत जी को पहाड़ी भाषा में ही बोलना, सीखना पड़ा था। घर परिवार के लोगों के साथ सहज स्वाभाविक स्थिति भी वे पहाड़ी में ही बोलते थे। यह उनका अधिक गहरा स्वाभाविक संस्कार था। मरने से पूर्व बाहरी आवरण उसी क्रम से उतरते हैं जिस क्रम से कि उन्हें पहना या प्रयोग किया गया है। कपड़े उतारते समय हम पहले कोट उतारते हैं उसके बाद कुर्ती सबसे अन्त में बनियान। बनावटी कृत्रिमता की परतें आत्मा के अन्तकाल में सबसे पहले उतरती हैं। जो दूसरों के दिखाने के लिए गढ़ा गया है वह व्यक्तित्व सबसे पहले समाप्त होता है फिर देर तक अभ्यास में रहा स्वभाव उतरता है और अंततः जीवात्मा की वे मूलभूत आस्थाएँ और आकाँक्षाएँ ही शेष रह जाती हैं जिनमें पूरी तरह व्यक्तित्व धुल या लिपट गया था।
दुष्कर्म कर्ता और दुर्बुद्धिग्रस्त मनुष्य मरते समय डरावने दृश्य देखते हैं और उन्हें अपने चारों ओर भय तथा आतंक का वातावरण छाया दीखता है।यमदूतों की डरावनी आकृतियाँ — उनकी धमकियाँ तथा प्रताड़नाएँ भी उन्हें अनुभव होती हैं। मरने के उपरान्त जीव एक विश्राम निद्रा में कुछ समय के लिए चला जाता है। यदि अन्तःकरण शान्त और सन्तुलित हुआ तो उस स्थिति में सुसंस्कारों की प्रतिक्रिया स्वर्गीय सुखानुभूति जैसी होती रहती है यदि जीवन कुमार्गगामी, चिन्तन तथा क्रिया −कलापों में बीता है तो उस अवधि में डरावने नारकीय दृश्य दीखते रहेंगे और वैसी ही कष्टकारक अनुभूति होती रहेगी मृत्यु और जीवन जन्म के बीच में जो थोड़ा अवकाश मिलता है उसमें आत्मा को यही स्वप्न दिखाई देते रहते हैं। इन्हें ही परलोक गत स्वर्ग नरक कहा जा सकता है स्वर्गीय दृश्य देखकर सुखद सन्तुष्ट निद्रा पूरी करके जगा हुआ जीव−ताजगी और स्फूर्ति लिए होता है और नवीन जग में प्रगतिशील मनःस्थिति तथा परिस्थिति प्राप्त करता है इसके विपरीत नरक के दृश्यों से डरता, काँपता आधा अधूरा विश्राम लेकर नये शरीर में प्रवेश हुआ प्राणी डडडड बुद्धि, कुसंस्कारी एवं हीन व्यक्तित्व का होता है वैसे ही घटिया वातावरण में उसे जन्म भी मिलता है। स्वर्ग नरक और पुनर्जन्म में कैसी अनुभूति मिलेगी, कैसी स्थिति रहेगी इसे जानने के लिए किसी व्यक्ति का जीवन −क्रम कि प्रकार व्यतीत हुआ है इसे देखना होगा। जो जैसा सोचता और करता रहा है उसे तद्नुरूप में परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा। कर्मफल एक ऐसी सुनिश्चित संभावना है जिसे किसी भी प्रकार टाला नहीं जा सकता।
दार्शनिक वेकन कहते थे— “ मृत्यु मानव जीवन के लिए सबसे छोटी विपत्ति है।” जिनमें जीवन को −मृत्यु की तैयारी को ध्यान में रखते हुए जिया है सचमुच उनके लिए मरण एक चिर प्रतीक्षित सुखद क्षण है उसे सामने देखकर उन्हें तनिक भी विचलित नहीं होना पड़ता। भयाक्रान्त तो वे होते हैं जिनने जिन्दगी को मौज−मजा करने का माध्यम माना और स्वार्थ लिप्सा की पूर्ति के लिए अनर्थ करने में भी नहीं चूके।
विवेकवान सज्जन सहृदय मनुष्यों को मरने के समय सुखद अनुभूतियाँ होती रही हैं यह उनके जन्म समय कहे गये वचनों से भली प्रकार प्रकट होता है।
महाप्रभु ईसा न अपने शिष्यों से कहा था— मैं जीवन हूँ और पुनर्जीवन भी।जो मेरा विश्वास करता है सदा जीवित रहेगा भले ही वह शरीर से मर चुका ही क्यों न हो।
बाइबिल की कथा है— मृत्यु देखने के लिए ही जीवन का अन्त है, वस्तुतः कोई मरता नहीं, जीवन शाश्वत है।
प्रख्यात साहित्यकार विलियम हण्टर जब मर रहे थे तब वे बोले — ‘यदि इस क्षण मेरे हाथों में कलम पकड़ने की ताकत रही होती तो लिखता कि मरण कितना आनंददायक और कितना आसान है।
विद्वान पीन ने अपने एक मित्र की मृत्यु के समय के संस्मरण में लिखा है। मरते समय वह अपने बेटे से बोला जिम, देखो सामने कितना सुन्दर भवन खड़ा है— उसमें कितना अच्छा प्रकाश है। यह ज्योति मेरे ही लिये तो है। इतना कहकर उसने आँखें बन्द कर लीं।
लन्दन के पादरी लेजली वेदरहुड एक मरणासन्न रोगी के निकट प्रार्थना करने के लिए गये। वे उसका हाथ पकड़े चारपाई के सिरहाने बैठे थे। रोगी ने मूर्छा छोड़कर आँखें खोली और कहा— मेरा हाथ पीछे मत खींचो मुझे आगे जाने दो जहाँ मुझे स्वागत पूर्वक बुलाया जा रहा है।
यहूदी विद्वान सोलमन ने लिखा है— इस जीवन के बाद भी एक जीवन है। देह मिट्टी में मिलकर एक दिन समाप्त हो जायगी फिर भी जीवन अनन्तकाल तक यथावत् बना रहेगा।
दार्शनिक नशाद सुँश ने कहा है− आत्मा की अमरता माने बिना मनुष्य को निराशा और उच्छृंखलता से नहीं बचाया जा सकता। यदि मनुष्य को आदर्शवादी बनना हो तो अविनाशी जीवन और कर्मफल की अनिवार्यता के सिद्धान्त उसके गले उतारने ही पड़ेंगे।
ख्यातिनामा साहित्यकार विक्टर ह्यूगो ने लिखा है− कब्र में अन्धकार और श्मशान की नीरवता की बात ने मुझे कभी क्षुब्ध नहीं किया। क्योंकि मैं सदा विश्वास करता रहा— शरीर को तो नष्ट होना ही है पर आत्मा को कोई भी घेरा कैद नहीं कर सकता। उसे उन्मुक्त विचरण करने का अवसर सदा ही मिलता रहेगा।
वस्तुतः मृत्यु न तो कोई अचम्भे की वस्तु है और न डरने की। वह जीवन क्रम में अविछिन्न रूप से जुड़ी हुई एक सरल और स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसमें पुरातन का नवीनीकरण का सुखद परिवर्तन जुड़ा हुआ है। यदि जीवन सरल रहे तो मृत्यु के जटिल और भयंकर लगने का फिर कोई कारण न रहेगा।