हमारी वसीयत और विरासत (भाग 147): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
युगसंधि सन् 2000 तक है। अभी उसमें प्रायः 14 वर्ष हैं। हर साल इतने जन्मदिन भी मनाए जाते रहें, तो 1 लाख कार्यकर्त्ताओं के जन्मदिन 1 लाख यज्ञों में होते रहेंगे। देखा-देखी इसका विस्तार होता चले, तो हर वर्ष कई लाख यज्ञ और कई करोड़ आहुतियाँ हो सकती हैं। इससे वायुमंडल और वातावरण दोनों का ही संशोधन होगा, साथ ही जनमानस का परिष्कार करने वाली अनेक सत्प्रवृत्तियाँ इन अवसरों पर लिए गए अंशदान-समयदान संकल्प के आधार पर सुविकसित होती चलेंगी।
2. एक लाख को संजीवनी-विद्या का प्रशिक्षण— शान्तिकुञ्ज की नई व्यवस्था इस प्रकार की जानी है, जिसमें 500 आसानी से और 1000 ठूँस-ठूँसकर नियमित रूप से शिक्षार्थियों का प्रशिक्षण होता रह सकता है। इस प्रशिक्षण में व्यक्ति का निखार, प्रतिभा का उभार, परिवार सुसंस्कारिता, समाज में सत्प्रवृत्तियों का संवर्द्धन जैसे महत्त्वपूर्ण पाठ नियमित पढ़ाए जाएँगे। आशा की गई है कि इस स्वल्प अवधि में भी जो पाठ्यक्रम हृदयंगम कराया जाएगा; जो प्राण-प्रेरणा भरी जाएगी, वह प्रायः ऐसी होगी, जिसे साधना का— तत्त्वज्ञान का सार कह सकते हैं। आशा की जानी चाहिए कि इस संजीवनी-विद्या को जो साथ लेकर वापिस लौटेंगे, वे अपना कायाकल्प अनुभव करेंगे और साथ ही ऐसी लोकनेतृत्व-क्षमता संपादित करेंगे, जो हर क्षेत्र में हर कदम पर सफलता प्रदान कर सके। यह प्रशिक्षित कार्यकर्त्ता अपने क्षेत्र में पाँचसूत्री योजना का संचालन एवं प्रशिक्षण करेंगे।
मिशन की पत्रिकाओं के पाठक तो ग्राहकों की तुलना में पाँच गुने अधिक हैं। पत्रिका न्यूनतम पाँच व्यक्तियों द्वारा पढ़ी जाती है। इस प्रकार प्रज्ञा परिवार की संख्या प्रायः 24-25 लाख हो जाती है। इनमें नर-नारी शिक्षित वर्ग के हैं। सभी को इस प्रशिक्षण में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित किया गया है। 25 पीछे एक शिक्षार्थी मिले, तो उनकी संख्या एक लाख हो जाती है। युगसंधि की अवधि में इतने शिक्षार्थी विशेष रूप से लाभ उठा चुके होंगे। इन्हें मात्र स्कूली विद्यार्थी नहीं माना जाना चाहिए, वरन् जिस उच्चस्तरीय ज्ञान को सीखकर वे लौटेंगे, उससे यह आशा की जा सकती है कि उनका व्यक्तित्व महामानव स्तर का युगनेतृत्व की प्रतिभा से भरा-पूरा होगा।
वह शिक्षण मई 1986 से आरंभ हुआ है। उसकी विशेषता यह है कि शिक्षार्थियों के लिए निवास, प्रशिक्षण की तरह ही भोजन भी निःशुल्क है। इस मद में स्वेच्छा से कोई कुछ दे तो अस्वीकार भी नहीं किया जाता, पर गरीब-अमीर का भेद करने वाली शुल्क परिपाटी को इस प्रशिक्षण में प्रवेश नहीं करने दिया गया है। अभिभावक और अध्यापक की दुहरी भूमिका प्राचीनकाल के विद्यालय निभाया करते थे। इस प्रयोग को भी उसी प्राचीन विद्यालय-प्रणाली का पुनर्जीवन कहा जा सकता है।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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