Books - गीत माला भाग ११
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भारत माता प्रश्न पूछती है
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भारत माता प्रश्न पूछती है
भारत माता प्रश्न पूछती है, अपने संतानों से।
कब मुझको आजाद करोगे, चोरों से बेईमानों से॥
सोचा था पन्द्रह अगस्त सैंतालीस से अब अस्त हुये।
किन्तु प्रगति के, उन्नति के वे,स्वप्न भवन सब ध्वस्त हुए॥
भूल गये तुम सब जननी को, अपनी धुन में मस्त हुए।
पराधीन रहकर न किया, उन दुष्कर्मों से व्यस्त हुए॥
क्या कभी शिक्षा लोगों निर्दोषों से बलिदानों से॥
मिट गई इन बीते बरसों में, सरस कल्पनायें कितनी।
मन की मन में रह जाती हैं, मधुर भावनायें कितनी॥
तुमने कितने डेम बनाये, और योजनायें कितनी।
फिर भी भूखी सो जाती है, मेरी सन्तानें कितनी॥
रोने की आह आती है, इन अधिकांश मकानों से॥
कुछ पुत्रों को मिले मलाई, किन्तु अधिकतर भूखे हैं।
कुछ खेतों में हरियाली है, किन्तु अधिकतर सूखे हैं॥
चेहरे चमक रहे चोरों के, परिश्रमी के रूखे हैं।
गेहूँ चावल के खेतों में, आज उपजती ऊखें हैं॥
फिर भी फीका दूध पी रहे, बच्चे वीर जवानों के॥
केवल शासक बदले हैं पर, शासन अभी नहीं बदला।
रिश्वत खोर लुटेरों का, सिंहासन अभी नहीं बदला॥
दिन- दिन असहाय जनों का, शोषण अभी नहीं बदला।
भाई,भतीजों और सालों का, शोषण अभी नहीं बदला॥
आखिर कब तक दबे रहोगे, मुट्ठी भर शैतानों से॥
भारत माता प्रश्न पूछती है, अपने संतानों से।
कब मुझको आजाद करोगे, चोरों से बेईमानों से॥
सोचा था पन्द्रह अगस्त सैंतालीस से अब अस्त हुये।
किन्तु प्रगति के, उन्नति के वे,स्वप्न भवन सब ध्वस्त हुए॥
भूल गये तुम सब जननी को, अपनी धुन में मस्त हुए।
पराधीन रहकर न किया, उन दुष्कर्मों से व्यस्त हुए॥
क्या कभी शिक्षा लोगों निर्दोषों से बलिदानों से॥
मिट गई इन बीते बरसों में, सरस कल्पनायें कितनी।
मन की मन में रह जाती हैं, मधुर भावनायें कितनी॥
तुमने कितने डेम बनाये, और योजनायें कितनी।
फिर भी भूखी सो जाती है, मेरी सन्तानें कितनी॥
रोने की आह आती है, इन अधिकांश मकानों से॥
कुछ पुत्रों को मिले मलाई, किन्तु अधिकतर भूखे हैं।
कुछ खेतों में हरियाली है, किन्तु अधिकतर सूखे हैं॥
चेहरे चमक रहे चोरों के, परिश्रमी के रूखे हैं।
गेहूँ चावल के खेतों में, आज उपजती ऊखें हैं॥
फिर भी फीका दूध पी रहे, बच्चे वीर जवानों के॥
केवल शासक बदले हैं पर, शासन अभी नहीं बदला।
रिश्वत खोर लुटेरों का, सिंहासन अभी नहीं बदला॥
दिन- दिन असहाय जनों का, शोषण अभी नहीं बदला।
भाई,भतीजों और सालों का, शोषण अभी नहीं बदला॥
आखिर कब तक दबे रहोगे, मुट्ठी भर शैतानों से॥